.
अजीत सिंह

31 December 2017


साम्राज्यवादी ताकतेँ नहीं पसन्द करती थीं भगत सिंह को...



भगत सिंह की धमनियों में बहता था...वतनपरस्ती का लहू

साम्राज्यवादी ताकतें नहीं पसन्द करतीं भगत सिंह को

      दिल दिल में गरीबों, मजदूरों, किसानों और बेसहाराओं के प्रति अगाध मुहब्बत रखने वाले वीरा की आँखों में आ़जाद भारत का सपना था। उसके अरमानों में वह भारत था जहाँ जाति और धर्म का झगड़ा न हो। वतनपरस्ती के लहु से सराबोर वीरा के पैरों में साम्राज्यवादी व्यवस्था को कुचलने की ताकत थी। वह अपने जीते जी तानाशाही सरकार को उखाड़ फेंकने की क्षमता रखता था यही वजह थी कि साम्राज्यवादियों ने उसके इंकलाबी जीवन का जन्म होते ही उसे मौत के मुहाने पर खड़ा कर दिया।

अपनी माँ के लाडले वीरा का जन्म २८ सितम्बर १९०७ को पंजाब के एक गांव लायलपुर में हुआ था, जो अब पाकिस्तान के हिस्से में पैâसलाबाद के नाम से जाना जाता है। अपनी माँ का वह लाडला बालक जब वीरा से भगत बना तो उसने अपनी बड़ी माँ ‘भारत' की आँखो में अश्क और बदन पर बेड़ियाँ देखीं। माता विद्यावती की कोख से जन्म लेने वाले वीरा ने जब माँ भारती के दर्द को करीब से देखा, तभी बेबस और लाचार माँ भारती के अश्कों से एक महान क्रान्तिकारी का जन्म हुआ जिसे सरदार भगत सिंह के नाम से पूरा देश जानता है, जिसकी कर्मठता,क्रान्ति और कुर्बानी का कायल आज भी इस देश का हर देशभक्त नौजवान है।

      एक दुखियारी माँ के आँसुआें से जन्मे उस क्रान्तिकारी ने अपनी मातृ भूमि के दर्द को इस देश के हर गरीबों,मजदूरों और किसानों की आँखों में देखा था। भगत सिंह ने इस देश के गाँवों में, गरीबो की बस्ती में और मजदूरों के घरों में खुशहाली वापस लाने का सपना देखा था। वह शोषित और पीड़ित लोगों को आ़जाद कराना चाहते थें। उन्हे समाज में बराबरी का दर्जा और उनका हक दिलाना चाहते थें। वो समाज में समानता स्थापित करना चाहते थें।

      मगर यह एक कड़वा सच है कि भगत सिंह की नि:स्वार्थ व अगाध देशभक्ति और बढ़ती लोकप्रियता उस दौर में किसी भी कांग्रेसी नेताओं को चुभती थी। यहाँ तक की महात्मा गांधी भी भगत सिंह की लोकप्रियता को स्वीकार नहीं कर पा रहे थें। बेशक उस समय इस देश में ब्रिटिश हुकूमत का शासन था मगर अपने देश के कुछ नेताआें में भी साम्राज्यवाद की भावना चरम पर थी। चूँकि गरीबों का दर्द समझने वाले भगत सिंह शुरु से ही साम्राज्यवादी व्यवस्था के खिलाफ थें, वह न केवल अंग्रेजों की गुलामी से भारत को आ़जाद कराना चाहते थें बल्कि इस देश के हर एक आम आदमी की आ़जादी की बात करते थें। उनके सोच का भारत साम्राज्यवाद विहीन था। वो साम्राज्यवादी व्यवस्था की खिलाफत करते थें उन्होने ``साम्राज्यवाद मुर्दाबाद'' का नारा बुलन्द किया था। उनकी धमनियों में वतनपरस्ती का लहू बहता था।

      यह बात भारत के साम्राज्यवादी नेताओं को नागवार लगती थी यही वजह थी कि इस देश में साम्राज्यवादी ताकतों ने अंग्रेजों के साथ षड़यंत्र रचकर सरदार भगत सिंह के क्रान्तिकारी जीवन का जन्म होने के साथ ही उन्हे फांसी के तख्त तक पहुँचा दिया और महज २३ वर्ष ५ माह की युवावस्था में ही माँ भारती का वह बेटा उसके दर्द को दूर किये बिना इस दुनिया से रुखसत हो गया। जिसकी कमी आज भी इस देश के हर सच्चे देशभक्तों को खलती है, जिसकी जरूरत आज भी भारत के किसानों को, गरीबों को,मजदूरों को और बेरोजगार नौजवानों को महसूस होती है। निश्चित रूप से यदि भगत सिंह जिन्दा होते तो इस देश की तस्वीर कुछ और ही होती आज भी यहाँ साम्राज्यवादियों का बोलबाला न होता।

      भगत सिंह ने साम्राज्यवादी व्यवस्था की खिलाफत की थी। यदि भारत में आज साम्राज्यवादी व्यवस्था का अन्त हो चुका होता तो इस देश के शासकों द्वारा भगत सिंह के जीवन के संघर्षों का बखान किया जाता। उनकी जिन्दादिली की दास्तान इस देश में जरूर प्रचारित की जाती मगर इस देश की सरकार आज भी भगत सिंह के संघर्षों की गाथा को छुपाना चाहती है। सरकार नहीं चाहती की भगत सिंह के विचार जन-जन तक पहँुचे। सरकार को इस बात का भय है कि कहीं भगत सिंह के विचारों का प्रचार-प्रसार हो जाने से देश में पुन: साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ एक नई क्रांति की शुरुआत न हो जाए। यह बातें इस बात को प्रमाणित करती है कि आज भी इस देश में साम्राज्यवादी व्यवस्था कायम है बल्कि सीधे शब्दों में यह कहा जाय कि भारत में आज भी साम्राज्यवादी सरकार का शासन चल रहा है तो गलत नहीं होगा।