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अजीत सिंह

31 December 2017


जानिए! किसने सलाखोँ के पीछे 113 दिनोँ तक किया था भूख हडताल...



साम्राज्यवादी व्यवस्था के खिलाफ सलाखों के पीछे 113 दिनों तक किया था भूख हड़ताल

भारत की क्रान्तिकारी भूमि पर पंजाब माता श्रीमती विद्यावती देवी की कोंख से जन्म लेने वाले वीर बालक भगत सिंह ने अपने जिन्दगी की अन्तिम सांस तक साम्राज्यवादी ताकतों का पुरजोर विरोध किया। अपने मुल्क की आवाम और मातृ-भूमि से बेइंतहा मोहब्बत करने वाले निडर व जाबा़ज क्रान्तिकारी भगत सिंह की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनके क्रांतिकारी विचार और फौलादी हौसले कभी कमजोर नहीं हुए। जिस प्रकार भगत सिंह अपने तमाम क्रांतिकारी कार्यक्रमों की योजना बनाकर उसका कुशलता के साथ नेतृत्व जेल के बाहर रहकर करते थें उसी तरह उन्होंने सलाखों के पीछे जेल की दीवारों के बीच भी अपने आन्दोलनों को जारी रखा। उन्होंने जेल में वैâदियों के साथ होने वाले अत्याचार के खिलाफ भी आवा़ज उठायी। इतना ही नहीं अपने इरादों के पक्के भगत सिंह की जायज मांगे जब जेल के अधिकारियों द्वारा नहीं मानी गयी तो उन्होंने पंजाब के जेल में ऐतिहासिक ११३ दिनों की भूख हड़ताल किया जो उस दौर में दुनिया का सबसे बड़ा रिकॉर्ड बना था।

१२ जून १९२९ को जब असेम्बली बम-काण्ड का ड्रामा खत्म हुआ। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को उम्र वैâद की सजा दी गयी तो उसके बाद भगत सिंह को दिल्ली से पंजाब ले जाकर मियांवाली जेल में व बटुकेश्वर दत्त को लाहौर केन्द्रीय जेल में रखा गया। उन्होंने गाड़ी में ही अगली कार्यवाही की योजना बना डाली कि जेल में राजनीतिक बंदियों से व्यवहार में सुधार कराया जायें। उनके अनुसार ``सजा पाने के बाद हमने देखा कि हमारे वर्ग के राजनीतिक वैâदियों की स्थिति बहुत खराब थी।'' जेलों में वैâदियों से क्रूर बल्कि अमानवीय व्यवहार किया जाता था, भगत सिंह ने अधिकारियों से मांग किया कि राजनीतिक बंदियों को अच्छी खुराक दी जाय, कड़ीr मेहनत न करवाई जाए, साबुन,तेल और ह़जामत बनाने का सामान दिया जाए, हर प्रकार का साहित्य-समाचार पत्र भी पढ़ने की व्यवस्था की जाए। उन्होंने अपनी मांगे मनवाने के लिए १५ जून १९२९ को जेल में ही भूख हड़ताल शुरु कर दिया। १७ जून १९२९ को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अलग-अलग नोटिसों में १५ जून से भूख हड़ताल शुरु करने की सूचना और अपनी मांगों की सूची सरकार को पेश की। बाद में १४ सितम्बर १९२९ को ये दोनों नोटिस पं. मदन मोहन मालवीय द्वारा लेजिस्लेटिव असेम्बली में पढ़े गये। १५ जून को भगत सिंह का वजन १३३ पांैंड था जो ९ जुलाई को घटकर ११९ पौंंड रह गया था। ३० जून १९२९ को लाहौर में एक विशाल सभा डा.किचलू की अध्यक्षता में हुई जिसमें मास्टर मोती सिंह जैसे देश भक्तों ने भगत व अन्य वैâदियों की मांगो का जोरदार समर्थन किया। मोहम्मद अली जिन्ना ने केन्द्रीय विधान सभा में भगत सिंह और उनके साथियों का जोरदार समर्थन किया और कहा: ``भगत सिंह और उनके साथियों से यूरोपीय वैâदियों जैसा सलूक किया जाना चाहिए।''

भगत सिंह के भूख हड़ताल के बारे में सुनकर देशभर के अन्य जेलों में बन्द वैâदियों ने भी भूख हड़ताल शुरु कर दिया। एक तरफ अलग-अलग जेलों में बंद देशभक्त वैâदियों ने भूख हड़ताल शुरु कर भगत सिंह का समर्थन किया तो दूसरी तरफ बंदियो की भूख हड़ताल की चर्चा अब देश के हर आदमी की जुबान पर थी। सहज सहानुभूति का माहौल बन गया था। देश की जनता में भी बहुतों ने खुद को भूखा रखकर भगत सिंह का समर्थन किया। कुछ अखबार भूख हड़तालियों की रोज की सेहत की खबर छापने लगे। अंग्रेजों के खिलाफ आवा़ज उठाने के लिए देश भर में बहुत सी सभाएँ की गई। अमृतसर के जलियावाला बाग में एक सभा कर नौकरशाहों को चेतावनी दी गई बंदियों को किसी तरह का नुकसान होने पर वे ही जिम्मेदार होंगे। लाहौर में एक सभा में दस हजार लोगों ने भूख हड़तालियों के साथ एकजुटता का इजहार किया। यह सहानुभूति इतनी व्यापक थी कि २१ जून सारे देश में ‘भगत सिंह दिवस’ के रूप में मनाया गया।

सरकार ने हड़ताल को तोड़ने के लिए कई तरकीबों का इस्तेमाल किया। बंदियों के कोठरियों के पानी के बर्तन दूध से भर दिए गए ताकि या तो बंदी प्यासे रहे या अपना उपवास तोड़ दें। अधिकारियों ने ़जबरदस्ती खाना खिलाने का पैâसला किया। भूख हड़तालियों ने इसका प्रतिरोध किया। एक बंदी ‘कसूरी’ ने अपनी खाने की नली को खराब करने के लिए काली मिर्च निगल कर गरम पानी पी लिया। जब सरकार ने देखा कि अनशन पर आम जनता का ध्यान बढ़ता जा रहा है तो उसने मुकदमा चलाने की कार्यवाही तेज कर दी जिसे लाहौर षडयंत्र के नाम से जाना जाता है। यह मुकदमा लाहौर के बोर्सटल जेल में १० जुलाई १९२९ को शुरु हुआ। पहले दर्जे के मजिस्ट्रेट ‘राय साहिब पंडित श्री किशन' इस मुकदमें के जज थे। अंग्रेजो की वफादारी के लिए पंडित जी को राय साहब की पदवी दी गयी थी। भगत सिंह तथा अन्य २७ लोगों पर हत्या, राजा के खिलाफ षडयंत्र और युद्ध छेड़ने का जुर्म लगाया गया। इन सभी २७ क्रांतिकारियों की औसत उम्र २२ वर्ष थी। उस समय भूख हड़ताल जारी रखे भगत सिंह के हाथों में हथकड़ी लगाए स्ट्रेचर पर अदालत में लाया गया था। तब तक जतिन्द्र नाथ दास की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। उनका अनशन ६३ दिन तक चल्ाा। अंतत: १३ सितम्बर १९२९ को जतिन्द्र दास शहीद हो गये।

भगत सिंह ने जतिन्द्र का नुकसान इस कदर महसूस किया कि उसे शब्दो में नही बताया जा सकता। क्योंकि वो बहुत भावुक थें इसलिए फूट-फूटकर रो पड़े। उन्होंने अपनी नोटबुक निकाली और धीरे से एक छंद बुदबुदाने लगे, जिसको उन्होने ``द नोबलेस्ट फॉलेन'' का शीर्षक दिया था।

‘`सर्वश्रेष्ठ जा चुके हैं। वे किसी निर्जन स्थान पर गुमनामी में दफन किए जा चुके हैं।
उनके लिए कोई आंसू नही गिरे,
अनजान हाथों ने उन्हे कब्र तक कंधा दिया,
कोई पदक, स्मारक या समाधी पर उनका शानदार नाम नही मिलता।
उनके स्थान पर घास उग आती है और उसकी नरम पत्तियाँ झुककर रहस्य बनाए रखती है। लेकिन ये ताकतवर लहरें भी उनके इतनी दूर बने घर तक विदाई गीत नहीं पहुँचा पाती।''

इन पंक्तियों के लेखक यू.एन.फिग्गर ज्यादा जाने पहचाने नही थे। मगर भगत सिंह को ये शब्द ठीक वैसे ही लगते थे जैसा कि वो खुद कहना चाहते थे। जतिन की मौत ने क्रांतिकारियों को और ज्यादा मजबूत कर दिया था। जतिन दास की मौत के बाद जेल कमेटी ने भगत सिंह और दत्त से उनकी भूख हड़ताल खत्म करने की दरखास्त की। लेकिन उन्हे मना नही पाई। आखिरकार, भगत सिंह के पिताजी इस काम के लिए आगे आए। उनके पास भूख हड़ताल खत्म करने के लिए कांग्रेस का दिया एक आग्रह था। क्रांतिकारी इस पार्टी की इज्जत करते थे, क्योंकि भारत की आ़जादी की लड़ाई के लिए वे इसका संघर्ष जानते थे। वे गांधी को एक ‘असम्भव सपना देखने वाला' मानते थे, मगर देश में जो जनजागरण वो लाए थे इसके लिए उनकी इज्जत करते थे। भगत सिंह और दत्त दोनों पार्टी के दरखास्त पर अपनी भूख हड़ताल खत्म करने पर राजी हो गये। यह ५ अक्टूबर १९२९, भूख हड़ताल का ११३वाँ दिन था जब भगत सिंह एक आयरिश क्रांतिकारी के ९७ दिन के भूख हड़ताल के विश्व रिकार्ड को पार कर गये थे। देश में आज भी कुछ ऐसे लोग तो हैं ही जिनके अरमानों में भगत सिंह जिन्दा है !
वर्तमान पाखण्डी सरकार की नीतियों को देखकर भगत सिंह के लिए कवि शैलेन्द्र की लिखी चन्द लाईनें याद आती हैं,जो इस प्रकार है :-

भगत सिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की
देश भक्ति के लिए आज भी सज़ा मिलेगी फांसी की।
यदि जनता की बात करोगे तुम गद्दार कहलाओगे
बंब-संब की छोड़ो भाषण दिया कि पकड़े जाओगे।
निकला है कानून नया चुटकी बजते बंध जाओगे।
निकला है कानून नया चुटकी बजते बंध जाओगे
न्याय-अदालत की मत पूछो सीधे ‘‘मुक्ति’’ पाओगे।
कांग्रेस का हुक्म ज़रूरत क्या वारन्ट तलाशी की।
मत समझो पूजे जाओगे क्योंकि लड़े थे दुश्मन से।
सत ऐसी आंख लड़ी है अब दिल्ली की लन्दन से
कामनवेल्थ कुटुम्ब देश की खींच रहा है मन्तर से
प्रेम विभोर हुए नेतागण रस बरसा है अम्बर से
भोगी हुए वियोगी दुनिया बदल गई वनवासी की।
गढ़वाली जिसने अंग्रेजी शासन में विद्रोह किया
वीर क्रान्ति के दूत जिन्होंने नहीं जान का मोह किया
अब भी जेलों में सड़ते हैं न्यू माॅडल आज़ादी है
बैठ गए हैं काले पर गोरे ज़ुल्मों की गादी है
वही रीति है वही नीति है गोरे सत्यनाशी की।
सत्य अहिंसा का शासन है रामराज्य फिर आया है
भेड़ भेड़िये एक घाट हैं सब ईश्वर की माया है
दुश्मन ही अपना टीपू - जैसों का क्या करना है
शांति सुरक्षा की ख़ातिर हर हिम्मतवर से डरना है
पहनेगी हथकड़ी भवानी रानी लक्ष्मी झांसी की।
ऊपर की पंक्तियों में बस कांग्रेस के साथ ‘‘और भाजपा’’ जोड़ लीजिए।